परिचय

महामना मालवीय मिशन ने ‘भारत रत्न’ महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी (1861-1946) का सम्पूर्ण वाङ्मय प्रकाशित करने का संकल्प लिया है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक, सनातन-धर्म के पुरोधा, स्वदेशी-स्वराज्य-स्वधर्म-स्वभाषा के प्रबल समर्थक महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी का कार्यकलाप भारतीय जीवन के सभी क्षेत्रों में व्याप्त रहा है। वह एक महान् स्वाधीनता सेनानी, शान्तिप्रिय राजनीतिज्ञ, अग्रणी समाज सुधारक, प्रखर शिक्षाविद्, यशस्वी पत्रकार, अनेक संस्थानों के जन्मदाता, कला-संगीत-साहित्य के मर्मज्ञ होने के साथ एक सफल अधिवक्ता भी थे। देश के तत्कालीन सभी प्रमुख राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों, राजा-महाराजाओं, शिक्षाविदों, पत्रकारों, उद्योगपतियों, समाजसेवियों से उनके अत्यन्त घनिष्ठ और आत्मीय सम्बन्ध थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए उन्होंने देशभर में प्रवास करके अनेक राजा-महाराजाओं, सेठ-साहूकारों से पत्राचार, सम्पर्क और धन-संग्रह किया था।

पत्रकारिता के शिखर-पुरुष मालवीय जी ने ‘हिंदोस्थान’ (1887), ‘अभ्युदय’ (1907), ‘मर्यादा’ (1910), ‘सनातनधर्म’ (1933)-जैसे अनेक पत्रों का सम्पादन किया था। मालवीय जी हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी और उर्दू के प्रकाण्ड पण्डित थे। हिंदी, संस्कृत, आयुर्वेद, ज्योतिष, आदि सम्मेलनों से वह सदा जुड़े रहे। हिंदी-भाषा, नागरी-लिपि और संस्कृत के उत्थान के लिए उन्होंने अथक प्रयत्न किये। सैकड़ों लेख और कविताएँ लिखीं। संस्कृत से प्रेम होने के कारण उन्होंने अनेक लेख और अभिलेख संस्कृत में लिखे थे जो आज भी देश के कुछ स्थानों पर उत्कीर्ण हैं। मालवीय जी पुराणों के अस्त-व्यस्त संस्करणों को और उनके अस्पष्ट-से अनुवादों को देखकर खिन्न थे। अतः वे चाहते थे कि समूचे स्मृति वाङ्मय, पुराणों और धर्मशास्त्रों को सम्पादित करके नये संस्करण निकाले जायँ। मंदिर और घाट आदि बनवाने के साथ-साथ इस कार्य को भी उन्होंने आवश्यक माना। देश और विदेशों में हिंदी, संस्कृत, उर्दू और अंग्रेज़ी में उन्होंने सैकड़ों भाषण, प्रवचन और व्याख्यान दिये।

महामना मालवीय जी एक व्यक्ति नहीं, अपितु संस्था थे। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस से वह प्रारम्भ से जुड़े रहे और चार बार उसके अध्यक्ष चुने गए थे। अपने देहावसान के प्रायः एक दशक पहले तक वह काँग्रेस के सभी अधिवेशनों में सम्मिलित हुए थे। उन्होंने ‘अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन’ (प्रयाग), ‘अखिल भारतीय हिंदू महासभा’, ‘भारती भवन पुस्तकालय’ (प्रयाग), ‘गौरी पाठशाला इंटर कॉलेज़’ (प्रयाग, 1904), ‘काशी हिंदू विश्वविद्यालय’ (वाराणसी, 1916), ‘हिंदू प्रवर्धिनी सभा’ (प्रयाग), ‘गंगा महासभा’, ‘सेवा समिति’-जैसी अनेक संस्थाओं की स्थापना की।

‘अखिल भारतीय हिंदू महासभा’ के वह तीन बार अध्यक्ष चुने हुए थे। ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’, ‘श्रीकाशी विद्वत् परिषद्’, ‘अखिल भारतवर्षीय सनातनधर्म महासभा’, ‘भारत धर्म महामण्डल’, ‘ऋषिकुल-ब्रह्मचर्याश्रम’-जैसी देश की अनेक ग़ैर-राजनीतिक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उनका आशीर्वाद प्राप्त था।

इस तरह मालवीय जी मृत्युपर्यन्त राष्ट्र और समाज के हित में एकनिष्ठ भाव और ऊर्जा के साथ सतत रूप से संलग्न रहे। किन्हीं कारणों से मालवीय जी द्वारा लिखित, सम्पादित एवं उनसे सम्बन्धित अभिलेखों, पुस्तकों, भाषणों, समाचार-पत्रों एवं चित्रों का अभी तक कोई संग्रह (वाङ्मय) प्रकाशित नहीं हो सका था। महामना मालवीय मिशन, दिल्ली ने यह विराट् कार्य अपने हाथों में लिया है और देश के कोने-कोने से पूज्य मालवीय जी के प्रकाशित-अप्रकाशित लेख, पत्र, पुस्तकें, चित्र, मुक़दमों के काग़ज़ात, आदि अनेक सामग्री एकत्र की जा रही है। इस सम्पूर्ण सामग्री को महामना मालवीय मिशन द्वारा सम्पूर्ण वाङ्मय के रूप में मूल प्रतियों के प्रदाता के नामोल्लेख के साथ प्रकाशित किया जायेगा।

हमारे उद्देश्य को सफल बनाने के लिए सभी सुधीजनों से अपील है कि महामना मालवीय एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बन्धित पुराने पत्रों, अभिलेखों, भाषण, छायाचित्रों एवं रेखाचित्रों इत्यादि की मूल प्रति/छायाप्रति/फ़ोटोग्राफ महामना मालवीय मिशन, 52-53, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, दिल्ली को उपलब्ध कराने की अनुकम्पा करें, ताकि उस सामग्री को वाङ्मय में समायोजित किया जा सके। इसके लिए महामना मालवीय मिशन आपके प्रति सदैव आभारी रहेगा।